“श्री भादरारायजी” ( इस गांव के नाम श्री भादरियाजी को जोड़ते हुए ) “श्रीआईनाथजी” एवं “श्रीस्वांगिया माताजी” ( जो हाथ में स्वांग यानी भाला धारण किए हुए हैं ) इन नामों से जानी जाने वाली माताजी, भाटी वंश से उत्पन्न सभी समुदायों की कुलदेवी का मंदिर जैसलमेर रियासत के तत्कालीन नरेश महारावल गजसिंहजी भाटी द्वारा एक युद्ध में अप्रत्याशित जीत होने पर विक्रम संवत 1888 में राजा-रानी ने पैदल जैसलमेर से श्री भादरियाजी पहुंच कर मंदिर निर्मित करवाया, इसके साथ-साथ इस मंदिर की 3 कोस ( लगभग 8 किलोमीटर की परिधि ) को दूध की धार दिलवाकर लगभग सवा लाख (1,25,000) बीघा भूमि “ओरण” स्वरूप श्री भादरियाजी माताजी को भेंट की। आज से 80 वर्ष पूर्व तत्कालीन नरेश महारावल ज्वार सिंहजी ने इस मंदिर की पुनर्स्थापना की थी। तत्पश्चात श्री भादरियाजी महाराजश्री ने सन 1963 में इसका जीर्णोद्धार करवाया। इस ओरण में लाखों वृक्ष है, जिनकी देवी के रूप में मान्यता है। इसमें कोई हरा वृक्ष डाली तोड़ना एक अपराध माना गया है और उल्लंघन करने वाला दंडित किया जाता है, वो परंपरा आज भी विद्यमान है, साथ ही आपसी विवाद यहाँ बैठकर मिटाने की परंपरा है। राज आज्ञा यह भी थी कि अपराधियों को ओरण क्षेत्र में से गुजारते वक्त उनकी हथकड़ियां खोल दी जावे तत्पश्चात वापस लगा दी जावे। मंदिर के पीछे “जाल” का एक पुरातन वृक्ष है, जो माताजी का मूल स्थान माना जाता है। इस रेत के टीले पर एक भक्त द्वारा सुखी टहनी गाड़कर प्रार्थना की गई थी और उस दूसरे दिन उसमें कोपलें फूट गई। आज भी लोग यहां धागा बांधकर अपनी मनौती मांगते हैं और पूर्ण होने पर वापस दर्शन करने आते हैं।
44,000+ गौ-वंश
1 लाख 10 हज़ार बीघा में फैली
240 टन चारे की रोज़ाना ख़पत
इलाज़ हेतु 6 वार्ड का अस्पताल
हज़ारों की संख्या में वृक्षारोपण
फसल रोपण (ज्वार-बाजरा)
पक्षिओं को सरंक्षण
विदेशी पक्षिओं की आश्रय स्थली
9 लाख से ज्यादा किताबें
दुनिया के 7 धर्मों का संपूर्ण साहित्य उपलब्ध
वेद, आयुर्वेद, पुराण, उपनिषद की श्रंख्लायें
भारत और विश्व का सविंधान यहां मौजूद
प्रार्थना वाणी का विषय नहीं, सिर्फ ह्रदय के उदगार और मूक पुकार है तथा जीवन का प्रकाश है |

सत मत छोड़ो नरां, सत छोड़्यां पत जाय |
सत की बांधी लक्ष्मी, फेर मिलेगी आय ||

